मंगलवार, 29 अप्रैल 2014


थाईलैंड यात्रा

मैं दिनांक २३-०८-२०१३ को दोपहर १-३० तक कार्यालय का काम निबटाकर अपने साथी कर्मचारियों को लेते हुए घर से यात्रा का सामान  लिया और ऑटोरिक्शा से स्टेशन पंहुचा जहाँ जयपुर से कोलकाता कि ट्रैन अजमेर-सियालदाह एक्सप्रेस ३ बजे हमारा इन्तजार कर रही थी. ट्रैन हमारे पहुचते ही रवाना हो गई. ट्रैन मेरे घर के पास से होते हुए निकली। मेरे साथी लोग खाना लाये थे, चूँकि ऑफिस मैं व्यस्त होने के कारण सभी भूखे थे, सबने मिलकर खाना खाया। सभी के मन में पहली बार हवाई जहाज में बैठने और विदेश देखने कि उत्सुकता थी.
ट्रैन कि यात्रा में भी एक अलग ही दुनिया चलती है. भांति भांति के लोग संपर्क में आते है।  बीच-बीच में भिखारी और हिंजड़े भी आते है और भिखारी को तो एक बार फिर भी टाला जा सकता है परन्तु हिंजड़े तो अपना हिस्सा लेकर ही जाते है।  यात्रा के दौरान अलग- अलग क्षेत्र-राज्यों के लोग मिले।
अगले दिन सायं ५ बजे हम  सियालदाह स्टेशन उतरे। कोलकाता हम पहली बार गए थे। वहाँ होटल मैं रात को विश्राम किया मिस्टी दही और रसगुल्ले खाये ।
अगले दिन विक्टोरिया मेमोरियल, वेल्लूर मठ, काली मंदिर देखा।




रात को हमारी नेताजी सुभाष चन्द बोस एअरपोर्ट से फ्लाइट थी। नियत समय पर हमने फ्लाइट पकड़ी, मैंने विंडो सीट ली थी, वहाँ से नीचे का नजारा बड़ा ही प्यारा था। फ्लाइट उतरने से पूर्व मेरे कान में बहुत दर्द हुआ। प्रात: ५ बजे हम बैंकॉक एअरपोर्ट उतरे।
एअरपोर्ट पर ही वीसा लेना था, वीसा आवेदन पर लगाई जाने वाली फोटो सामान्य पासपोर्ट फोटो से अलग साइज़ की होने से अधिकांश लोगो ने वीसा विंडो के पास वाले काउंटर पर कंप्यूटर से वीसा फार्म पर १०० थाई बाट लेकर फोटो प्रिंट किया जा रहा था। एअरपोर्ट से बाहर आकर हमने बैंकाक सिटी जाने के लिए साधन ढूंढ़ने लगे, पूछताछ करने का प्रयास किया, किन्तु भाषा नहीं समझने के कारण काफी मुश्किल से हमने एअरपोर्ट से  बस पकड़कर स्काई ट्रैन स्टेंड पहुचे। ट्रैन से नाना स्टेशन पहुचे फिर वहाँ से टुक - टुक पर बैठकर चोरंडी हॉस्टल, खो सेन रोड पहुचे।
कुछ समय आराम करने के बाद भूख लगी तो हम उम्दा खाने कि आस लिए रेस्टोरेंट कि तलाश में निकल पड़े।  इस तलाश के दोरान हमने देखा कि ठेलो पर महिलाये अलग अलग प्रकार के कीड़े यहाँ तक की बिच्छू सजाकर बेच रही थी, रेस्टोरेंट्स में भी चिकन, मछली ही देखने को मिले। रेस्टोरेंट तो बहुत थे किन्तु हमारे खाने योग्य खाना मिलना मुश्किल लग रहा था, काफी देर घूमने के बाद एक विदेशी कन्या हाथ में इंडियन खाने का मेनू कार्ड लिए मिली, तो ऐसा लगा जैसे मरुस्थल में पानी मिल गया हो। वो हम लोगो को अपने रेस्टोरेंट में ले गई जो किसी पंजाबी ने खोल रखा था, खाए अपनी पसंद का खाना मिल गया वहाँ के मूल्यों पर।  जी, हाँ । वहाँ के मूल्यों पर । इतना महंगा खाना कि हमें समझ में आ गया कि अगले ७ दिनों तक हमारी जेब का अधिकांश भार खाने में ही जाने वाला है। 
बहरहाल खाना खाने के बाद हम होस्टल आये और आराम किया, रात १० बजे बाहर निकले तो नज़ारा ही बदल चूका था बाजार की रोनक अपने पूर्णता पर थी, जहां दिन में ट्राफिक था रात को वहाँ पर रेस्टोरेंट वालो ने टेबल सजा दी थी और लगभग सभी में तेज आवाज में गायक गाने गा रहे थे, जमकर शराब पी रहे थे, नाच रहे थे।   हमारे लिए ये सब किसी आश्चर्य से कम नहीं था। मेरे विचार में बैंकाक कि नाईट लाइफ देखने के लिए खो सेन रोड एक बेहतरीन स्थान है। 
अगले दिन प्रात: हमने वेट अरुण (Wat Arun) देखा। यहाँ मंदिर प्रवेश का टिकेट लेना होता है।   यहाँ की कुछ फोटो नीचे है :-


इस ही वेट अरुण में हमने महात्मा गांधी के तीन बंदरो के स्टेचु  और श्री गणेश जी का मंदिर भी देखा। 



इतने पर बरसात आ गई। मंदिर कि साफ़-सफाई देखते ही बनती थी। मंदिर के पास ही नदी थी हम बरसात तक रुके रहे। यहाँ के मंदिर में लोग दान केवल दान पात्र में ही डालते है फैंकते नहीं है। 

तेल भी चढ़ाते है उसके लिए स्थान बना होता है नीचे फोटो में आप देख सकते है कि मेरे साथी शिवपाल तेल चढ़ा रहे है 

मंदिर में महात्मा बुद्ध की प्रतिमा सुसज्जित थी वहाँ के सेवादार सेवा में जुटे हुए थे 

यहाँ स्त्रियां सामान्यतया हाफ-पेंट पहनती है, किन्तु मंदिर में प्रवेश से पूर्व वहाँ उपलब्ध पूरे शरीर को ढकने वाला वस्त्र पहनती है। 

सामन्यतया बैंकाक में भारतीय खाना नहीं मिलता है जो मिलता है वो महंगा मिलता है, परन्तु यहाँ इंडिया मार्किट में भारतीय भोजन आसानी से और सही डरो पर उपलब्ध है.